Let’s Come Together To Become The Voice Of Martyrs



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LET’S COME TOGETHER TO BECOME THE VOICE OF MARTYRS

There are many mothers who have lost their sons on the battlefield fighting for the motherland, sisters who have lost their brothers, women who have lost their husbands ,the innocent children who have become orphans and whose tender feet were put on the hard paths despite being in their father’s laps. Such families bear extremely hard times. The whole country mourns for the martyrdom of such brave heroes. Their sacrifice for the nation is priceless, and as citizens we do recognize the sacrifice they made, that’s why our heads bent down automatically at their memorials in respect. However, look at the irony, we have huge prizes being given in games. Though, no doubt that winning prizes in games is a matter of pride and takes the country forward and there is nothing wrong in it. However, on one hand a shooter in games gets 2 to 5 crores as prize money for getting a medal, given appointment to the top positions without any exam/interview. There is also nothing wrong in giving this assistance with aim to promote the growth of sports but what requires a deliberation is “What happens to the real life shooters, the real heroes?”

They are given Rs. 10-11 lakhs in case their life is lost in service, their children have to pass exams for getting jobs, some have to repeatedly go to officials for even getting what is their due. Some of those in family who do not get the job are compelled to do labor jobs. Don’t they deserve a lot better?

In the very foundation of the country’s democratic structure, the parliament which the martyrs have laid down with their blood, film stars, business personalities are being chosen/appointed both in Lok Sabha and Rajya Sabha. We are not against that thing since we are a democratic country and everyone who wished to contribute to the growth of nation is welcome to do it but we just want to notice of the political parties of the country that why we leave behind the actual heroes of the country whose sacrifices for nation are beyond anything and who even knowing that they might put their families into bloody tears, never hold behind and always say the same:-

Apni Azadi Ko Hum, Hargis Mita Sakte Nahi,
Sar Kata Sakte Hain, Lekin Sar Jhuka Sakte Nahi.

Jai Hind !!

We have taken just a small step towards reaching to the families of our real heroes. Let’s join hand together and carry the initiative ahead and make the voices of those who gave their life for us heard to the top levels.


आओ हम सब मिलकर बने आवाज शहीदों की

अपनी मात्रभूमि के लिये कितनी माताओं ने आपले लाल गवायें है, कितनी ही बहनो के भाई बिछुड़ गये जिनकी राखियाँ सिमट गयी , कितनी ही विरांगनाएं हैं जिन्होने अपने सिन्दूर को अपनी मांग से सदा-सदा के लिये पोंछ दिया| कितने मासूम अनाथ हो गये जिनके नाजुक पांव बाप की गोद की बजाये, कठोर पथ पर पड़े| ऐसे परिवारों पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा है, उन शहीदों की शहादत पर देश रोया| उन लाखों शहीद परिवारों के साथ-साथ देश शहीदों की शहादत पर गर्व महसूश करता है| तभी तो शहीदों के स्मारक के सामने सिर खुद ब खुद उनके सम्मान में झुक जाते हैं|

देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिये मोटे-मोटे ईनाम बांटे जाते हैं| इसमें कोई संदेह नहीं खेलों में पदक मिलने पर देश का नाम रोशन होता है| ऐसा होना बड़े गर्व की बात है| खेलों में निशानेबाज़ को पदक लाने पर सरकार की तरफ से 2 से 5 करोड़ रुपया ईनाम दिया जाता है और बिना किसी परीक्षा या साक्षात्कार के उच्च पदों पर नियुक्ति दी जाती है| अच्छी बात है|

परंतु विडम्बना देखिये ? शरहदों की रक्षा करते हुये वास्तविक निशानेबाज़ की शहादत पर परिवार को 10 से 11 लाख रुपये दिये जाते हैं| बच्चों को नोकरी के नाम पर परीक्षा देनी पड़ती है और राजनेताओं के चक्कर लगाने पड़ते हैं| फिर भी नौकरी नहीं मिलती| सरकार द्वारा निर्धारित आयु सीमा समाप्त हो जाती है| जिसके पश्चात मजदूरी तक करने को मजबूर होना पड़ता है|

देश की जिस संसद की नींव को शहीदों ने अपने खून से सींचा है| उस संसद भवन में फिल्मों के हीरो हिरोइनो को लोक सभा और राज्यसभा के लिये चुना / मनोनीत किया जाता है| हम इसका विरोध नहीं कर रहे लोकतंत्र मैं हर नागरिक का अधिकार है परन्तु हमारे अभिनेताओं को राजनीति में आने की क्या आवश्यकता है वो तो पहले ही नेताओं से बड़े हैं जो अपनी कला के माध्यम से दुनिया को बदलने की क्षमता रखते हैं जिनके चाहनेवाले नेताओं से कहीं अधिक संख्या में हैं| यहाँ भी विडम्बना देखिये हम देश के उन असली हीरो को पीछे छोड़ देते हैं, जिनकी शहादत पर शहीद परिवारों ने संसद भवन की साख को कायम रखने के लिये खून के आंसू झेले है| फिर भी आह तक नहीं की और बस यही चाहा:-


अपनी आजादी को हम, हरगिज मिटा सकते नहीं
सर कटा सकते है लेकिन, सर झुका सकते नहीं…
जय हिन्द !!

आयें हमारे साथ, बढ़ाये अपने हाथ |